<?xml version="1.0" encoding="UTF-8"?><rss xmlns:dc="http://purl.org/dc/elements/1.1/" xmlns:content="http://purl.org/rss/1.0/modules/content/" xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0" xmlns:media="http://search.yahoo.com/mrss/"><channel><title><![CDATA[Prashant Pole]]></title><description><![CDATA[राष्ट्रीय चिन्तक, विचारक, लेखक. व्यवसाय से अभियंता (आई. टी. व टेलिकॉम). तकनिकी एवं प्रबंधन सलाहकार.]]></description><link>https://prashantpole.com/</link><image><url>https://prashantpole.com/favicon.png</url><title>Prashant Pole</title><link>https://prashantpole.com/</link></image><generator>Ghost 3.1</generator><lastBuildDate>Wed, 08 Apr 2026 11:11:34 GMT</lastBuildDate><atom:link href="https://prashantpole.com/rss/" rel="self" type="application/rss+xml"/><ttl>60</ttl><item><title><![CDATA[बंटवारे का दर्द / १]]></title><description><![CDATA[बंटवारे का दर्द बहुत तीखा होता हैं. एक करोड़ से ज्यादा भारतीयों ने इस दर्द को झेला हैं. लगभग बीस लाख हिन्दू – सिक्ख इस बंटवारे के कारण मारे गए हैं. लाखों माता – बहनों की इज्जत के साथ खिलवाड़ हुई हैं. अनेक घर – बार, आशियाने उजड़ गए हैं.]]></description><link>https://prashantpole.com/pain-of-partition-part-1/</link><guid isPermaLink="false">60191b6fe7990017e04d6001</guid><category><![CDATA[India]]></category><category><![CDATA[Partition]]></category><category><![CDATA[1947]]></category><category><![CDATA[India Pakistan]]></category><category><![CDATA[Insia Partition]]></category><category><![CDATA[Rashtriya Swayam Sevak Sangh]]></category><category><![CDATA[Prashant Pole]]></category><category><![CDATA[बँटवारा]]></category><category><![CDATA[बँटवारे का दर्द]]></category><category><![CDATA[भारत का बँटवारा]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Tue, 02 Feb 2021 09:42:23 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/02/13912492_10204893915827902_1859882883727112372_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/02/13882624_10204893914187861_4627015786270445116_n.jpg" class="kg-image" alt="बंटवारे का दर्द / १"></figure><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/02/13912492_10204893915827902_1859882883727112372_n-1.jpg" alt="बंटवारे का दर्द / १"><p>विभाजन टल सकता था..!</p><p>- प्रशांत पोल <br></p><p>‘और १५ अगस्त १९४७ को हमारा देश बट गया..!’<br></p><p>इस वाक्य के साथ कहानी का अंत नहीं हुआ. वरन एक अंतहीन से दिखने वाले लंबे संघर्ष का प्रारंभ हुआ..!<br></p><p>बंटवारे का दर्द बहुत तीखा होता हैं. एक करोड़ से ज्यादा भारतीयों ने इस दर्द को झेला हैं. लगभग बीस लाख हिन्दू – सिक्ख इस बंटवारे के कारण मारे गए हैं. लाखों माता – बहनों की इज्जत के साथ खिलवाड़ हुई हैं. अनेक घर – बार, आशियाने उजड़ गए हैं.<br></p><p>उन मारे गए अभागे हिन्दू – सिक्ख भाइयों की लाशों पर, हमारे मां- बहनों की करुण चीख पुकारों पर, अभागे शिशुओं की बीभत्स मौत पर, हमारे तत्कालीन नेताओं की हठधर्मिता पर और तुष्टीकरण की राजनीतिक नपुंसकता पर.. हमारी स्वतंत्रता खड़ी हैं..!</p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/02/13912492_10204893915827902_1859882883727112372_n.jpg" class="kg-image" alt="बंटवारे का दर्द / १"></figure><p>विभाजन तो टल सकता था, यदि १९२३ के काकीनाडा अधिवेशन में पंडित विष्णु दिगंबर पलुस्कर जी को वन्दे मातरम के गायन के विरोध को गांधीजी गंभीरता से लेते. १९२३ में कांग्रेस के काकीनाडा अधिवेशन का पहला दिन. अधिवेशन के शुरुआत में वंदे मातरम् गाया जाने वाला था. प्रख्यात गायक पं. विष्णु दिगंबर पलुस्कर खुद इस राष्ट्रगान को गाने वाले  थे. मंच पर गांधीजी और कांग्रेस के अध्यक्ष, अली बंधुओं में से एक, महंमद अली, उपस्थित थे. जैसे ही पं. पलुस्कर ने वंदे मातरम् गाना प्रारंभ किया, तो गांधीजी की उपस्थिति में महंमद अली ने उन्हें रोकने का प्रयास किया. पर पलुस्कर जी कहां रुकने वाले... वे तो गाते ही चले.. यह देखकर गुस्से में महंमद अली ने मंच छोड़ दिया. हमारा दुर्भाग्य इतना की गांधीजी ने महंमद अली की भर्त्सना करना तो दूर, उनका साथ दिया..!</p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/02/13925079_10204893916307914_701486437382513770_n.jpg" class="kg-image" alt="बंटवारे का दर्द / १"></figure><p>मुसलमानों के तुष्टीकरण की राजनीति का प्रारंभ हो चुका था.. जिसका सबसे बड़ा पड़ाव था, भारत विभाजन..!!<br></p><p>इन्ही अली बंधुओं ने गांधीजी को खिलाफत आन्दोलन के लिए तैयार किया था.. इन्ही अली बंधुओं ने भारत को दारुल हरब (संघर्ष की भूमि) बनाने का फतवा जारी करवाया था... यही अली बंधू बाद में देश का बंटवारा करने वाले मुस्लिम लीग में शामिल हुए. और जिन्हें महात्मा गाँधी अपना भाई कहकर पुकारते थे, उन्ही महंमद अली जौहर ने गांधीजी के बारे में कहा, “पतित से पतित, गिरे से गिरा और व्यभिचारी से व्यभिचारी मुसलमान भी मुझे गाँधी से प्यारा हैं..!”<br></p><p>हमारे देश का दुर्भाग्य था.. की फिर भी हमारे तत्कालीन नेतृत्व की आँखे नहीं  खुली.. मुस्लिम लीग को पुचकारना जारी रहा... अगले बीस / पच्चीस वर्ष तुष्टीकरण का यह सिलसिला चलता रहा... मुस्लिम लीग मांगे रखती गई, तत्कालीन कांग्रेस का नेतृत्व प्रारंभ में ना – नुकुर करने के बाद उन्हें मानता रहा.. हामी भरता रहा. मुस्लिम लीग झुकाती गई, कांग्रेस झुकती गई..! किसी जमाने में विश्व व्यापार में सिरमौर रहा, दुनिया का सबसे समृध्दशाली और वैभवशाली राष्ट्र इस विटंबना को, इस आपमान को सहता रहा..!</p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/02/13925057_10204893915147885_8926945168013409319_n.jpg" class="kg-image" alt="बंटवारे का दर्द / १"></figure><p>पूरे भारत वर्ष को एक रखने का आग्रह करने वाले, राष्ट्रवादी और स्वाभिमानी नेतृत्व को कांग्रेस ने बाजू में रखा, उनको अपमानित भी किया. सुभाषचंद्र बोस जैसा क्रांतिकारी और दूरदर्शी नेतृत्व कांग्रेस को जमा नहीं. राजश्री पुरषोत्तम दास टंडन जैसे स्वाभिमानी व्यक्ति को कांग्रेस ने मुख्य धारा से अलग किया और जवाहरलाल नेहरु जैसे माउंटबेटन परिवार के प्रेम में आकंठ डूबे व्यक्ति के हाथों कांग्रेस की बागडोर आई.. और देश का भविष्य उसी समय लिखा गया..!!                              (क्रमशः)</p><p>- प्रशांत पोल   <br></p><p><br></p>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[हिंदुत्व / ४  : समरस हिन्दू]]></title><description><![CDATA[आज के हिन्दू समाज में अनेक विषमताएं हैं. जाती – पाती, उच्च – नीच, वर्ण आदि अनेक ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर अनेकों बार समाज बटा हुआ सा लगता हैं.]]></description><link>https://prashantpole.com/hindutwa-4-samras-hindu/</link><guid isPermaLink="false">6086c9ecb9f9d40fc07b17fa</guid><category><![CDATA[Hindu Mandir]]></category><category><![CDATA[Hindutwa]]></category><category><![CDATA[Hindu Samaj]]></category><category><![CDATA[Samras Hindu]]></category><category><![CDATA[Prashant Pole]]></category><category><![CDATA[Who is a Hindu]]></category><category><![CDATA[Whom we can call Hindu]]></category><category><![CDATA[Hindu Dharm]]></category><category><![CDATA[What is hinduism]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Sat, 28 Mar 2020 14:10:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/91558760_10212551079492208_5263075747974610944_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/91558760_10212551079492208_5263075747974610944_n.jpg" class="kg-image" alt="हिंदुत्व / ४  : समरस हिन्दू"></figure><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/91558760_10212551079492208_5263075747974610944_n-1.jpg" alt="हिंदुत्व / ४  : समरस हिन्दू"><p>- प्रशांत पोल <br></p><p>आज के हिन्दू समाज में अनेक विषमताएं हैं. जाती – पाती, उच्च – नीच, वर्ण आदि अनेक ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर अनेकों बार समाज बटा हुआ सा लगता हैं.<br></p><p>क्या इतिहास में भी यही या ऐसी ही विषमताएं हिन्दू समाज में थी..? <br></p><p>इसका स्पष्ट उत्तर हैं – नहीं.<br></p><p>उत्तर वैदिक काल में, हिन्दू समाज में ऐसी विषमताएं नहीं थी. अगर होती तो हिन्दू समाज इतने सामर्थ्यशाली स्वरुप में, तत्कालीन विदेशी आक्रांताओं के सामने खड़ा ही नहीं रहता. उस समय का हिन्दू समाज समरस था. और इसीलिए एकरूप था. हमारे पुरखों ने ‘समता’ के तत्व को प्रारंभ से ही माना था. समता, बंधुता यह हमारे ‘मूल्य’ थे. सबसे प्राचीन ग्रन्थ ऋग्वेद के दसवे अध्याय में इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं. यह वेदमंत्र देखे –<br></p><p>समानी व आकूति: समाना ह्रुदयानी व: I</p><p>(ऋग्वेद १० / १९१)<br></p><p>इसका अर्थ हैं – हमारी अभिव्यक्ति एक जैसी, हमारी सोच एक जैसी, हमारे अन्तःकरण एक जैसे रहे (जिसके कारण हम संगठित रहे).<br></p><p>इसी श्लोक में आगे लिखा हैं –<br></p><p>संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम् I</p><p>देवा भागं यथा पूर्वे सञ्जानाना उपासते II<br></p><p>अर्थ – हम सब एक साथ चले. आपस में संवाद करे. हमारे मन एक हो. जिस प्रकार पहले के विद्वान अपने नीयत कार्य के लिए एक होते थे, उसी प्रकार हम भी साथ में मिलते रहे.<br></p><p>दूसरा एक और मंत्र देखिये –<br></p><p>समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सहचित्तमेषाम् I</p><p>समानं मन्त्रमभिमन्त्रये वः समानेन वो हविषा जुहोमि II</p><p>(ऋग्वेद अध्याय ८ / ४९ / ३)<br></p><p>अर्थ - इन (मिलकर कार्य करने वालों) का मन्त्र समान होता है. अर्थात ये परस्पर मंत्रणा करके एक निर्णय पर पहुँचते हैं, चित्त सहित इनका मन समान होता है. मैं तुम्हें मिलकर समान निष्कर्ष पर पहुँचने की प्रेरणा (परामर्श) देता हूँ, तुम्हें समान भोज्य प्रदान करता हूँ.<br></p><p>इनमे कही भी जाती का उल्लेख नहीं हैं. क्योंकि हमारे मूल ग्रंथों में कही भी जाती के आधार पर भेदभाव का एक भी (जी हां, एक भी) उदाहरण नहीं मिलता हैं.<br></p><p>तो क्या उस समय वर्ण व्यवस्था नहीं थी..?<br></p><p>उस समय वर्ण व्यवस्था को मानने वाला वर्ग समाज में था. लेकिन यह चातुर्वर्ण्य व्यवस्था, जन्म के आधार पर नहीं थी. वह गुणों के आधार पर थी. इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं. जिनको हम प्रकांड पंडित मानते हैं, ऋषि – मुनि मानते हैं, ऐसे अधिकांश विद्वानों का जन्म ब्राह्मण कुल में नहीं हुआ था.<br></p><p>महाभारत लिखने वाले महर्षि वेदव्यास मछुआरे के पुत्र थे. पराशर ऋषि, स्मशान में काम करने वाले चंडाल के घर पैदा हुए थे. जिनके नाम से गोत्र का निर्माण हुआ, ऐसे वसिष्ठ मुनि, एक वेश्या के पुत्र थे. ऐतरेय ब्राह्मण कुल के निर्माता महिदास, इतरा नाम की शूद्र स्त्री के कोख से जन्मे थे. दीर्घतमा ऋषि की माँ उशिज यह शूद्र दासी थी (आचार्य सेन – ‘भारतवर्ष में जाति भेद’ / पृष्ठ १२, १४, २४). सत्यकाम जाबाली की कथा हम सभी जानते हैं. इन सभी को समाज ने यदि दुत्कारा होता, ठुकराया होता तो क्या हिन्दू समाज इतना समृध्द होता..? अर्थात हिन्दू समाज गुणों की कद्र करता था. जन्म कुल की नहीं.<br></p><p>वर्ण यह जन्म के आधार पर नहीं थे और उनमे कोई उच्च – नीच ऐसा भाव नहीं था. काठकसंहिता में स्पष्ट लिखा हैं, “ज्ञान व तपस्या इन गुणों से ही मनुष्य ब्राह्मण बनता हैं. फिर उसके माता – पिता की चिंता क्यों करना ? वेद यही ब्राह्मणों के पिता हैं और उनके पितामह भी.”<br></p><p>उस समय वर्ण संकर था. अंतरजातीय विवाह धडल्ले से होते थे. महाभारत के वन पर्व में नहुष और युधिष्ठिर का संवाद हैं. इसमें नहुष के प्रश्न का उत्तर देते हुए युधिष्ठिर स्पष्ट रूप से कहते हैं, “हे नागेन्द्र, वर्तमान में सभी जगह वर्ण संकर होने के कारण किसकी कौन सी जाती हैं, यह कहना कठिन हैं. इसलिए ‘ब्राह्मण किसे कहे’, इस प्रश्न का उत्तर हैं, ‘जिसका चारित्र्य स्वच्छ हो, जो सदाचारी हो और अध्ययन करता हो, वही ब्राह्मण हैं. उसके माता – पिता, कुल चाहे जो भी हो.’<br></p><p>अर्थात प्राचीन समय में हमारे हिन्दू समाज में वर्ण भेद या जाती भेद नहीं था. वर्ग भेद था, ऐसा हम कह सकते हैं. कार्य के अनुसार वर्ग बनते थे.<br></p><p>वेदों के अनेक सूक्त क्षत्रियों ने लिखे हैं. ऋग्वेद के पहले मंडल के पहले दस मन्त्र मधुच्छंद ने लिखे हैं. वे क्षत्रिय थे. विश्वामित्र ऋषि के लिखे सूक्त ऋग्वेद में हैं. गायंत्री मन्त्र के रचयिता भी विश्वामित्र ही हैं. यह गाधी राजा के पुत्र थे. क्षत्रिय थे. यज्ञ निष्ठा, वेद संस्कृति, संस्कृत वाणी यह आर्यत्व के लक्षण थे. फिर कुल कोई भी हो. सीतामाई के पिता, राजा जनक ब्रम्हवेत्ता थे. क्षत्रिय होने के बाद भी अनेक ब्राह्मणों को उन्होंने ब्रम्हविद्या सिखायी. वैश्य समाज के अग्रणी महाराजा अग्रसेन यह क्षत्रिय ही थे.<br></p><p>राज व्यवहार चलाने में सभी जाती के लोग रहते थे. महाभारत में भीष्म ने इस बारे में कहा हैं – ‘राजा के तीन शूद्र मंत्री, चार ब्राह्मण मंत्री, आठ क्षत्रिय मंत्री, इक्कीस वैश्य मंत्री तथा एक सूत मंत्री होना चाहिए. (शांति पर्व ८५ / ५). ब्राह्मणों से शूद्र मंत्रियों की संख्या मात्र १ से कम हैं.<br></p><p>अर्थात प्राचीन काल में, धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक इन सभी क्षेत्रों में समता का तत्व, सामाजिक मूल्य के रूप में प्रस्थापित था. इसका अनुसरण कर, समाज एकरस, एकरूप हुआ था. और इसीलिए उस समय हिन्दू समाज, दुनिया का सबसे बलशाली समाज माना जाता था.<br></p><p>कालांतर में सामाजिक व्यवस्था में अनेक विकृतियां आती गयी और हिन्दू समाज की ताकत जाती रही...!</p><p>- प्रशांत पोल</p>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[हिंदुत्व / ३  : सामर्थ्यशाली हिन्दू]]></title><description><![CDATA[
हां. आज से दो हजार – तीन हजार वर्ष पहले, हिन्दू संगठित थे, समरस थे. और इसीलिए अत्यधिक सामर्थ्यशाली थे.
]]></description><link>https://prashantpole.com/hindutwa-3-samarthyashali-hindu/</link><guid isPermaLink="false">6086c95eb9f9d40fc07b17e6</guid><category><![CDATA[Hindu Dharm]]></category><category><![CDATA[Hindu Mandir]]></category><category><![CDATA[Hindu Samaj]]></category><category><![CDATA[Hindutwa]]></category><category><![CDATA[Who is a Hindu]]></category><category><![CDATA[Whom we can call Hindu]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Fri, 27 Mar 2020 14:08:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/90718269_10212543375579615_4158820230035931136_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/90718269_10212543375579615_4158820230035931136_n.jpg" class="kg-image" alt="हिंदुत्व / ३  : सामर्थ्यशाली हिन्दू"></figure><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/90718269_10212543375579615_4158820230035931136_n-1.jpg" alt="हिंदुत्व / ३  : सामर्थ्यशाली हिन्दू"><p>- प्रशांत पोल <br></p><p>हां. आज से दो हजार – तीन हजार वर्ष पहले, हिन्दू संगठित थे, समरस थे. और इसीलिए अत्यधिक सामर्थ्यशाली थे.<br></p><p>इसका उदहारण मिलता हैं, ग्रीक (यूनानी) सम्राट सिकंदर के आक्रमण के समय. पारसिक राष्ट्र के, अर्थात आज के ईरान के, शासकों का ग्रीक साम्राज्य से परंपरागत बैर था. विशाल पारसिक साम्राज्य के सामने, छोटे छोटे से यूनानी राजा कही न ठहरते थे. किन्तु सिकंदर के पिता, फिलिप ने, इन छोटे राज्यों को संगठित कर, यूनानियों का एक राज्य बनाया. ईसा पूर्व ३२९ में, फिलिप की मृत्यु के पश्चात, सिकंदर इस संगठित यूनानी राज्य की ताकत लेकर पारसिक साम्राज्य से भिड़ गया. और पहले ही झटके में उसने इस साम्राज्य को ध्वस्त किया. खुद को पारसिक का सम्राट घोषित कर वह आगे बढ़ा. रास्ते में बाबिलोनी साम्राज्य को भी उसने परास्त किया. वर्तमान के सीरिया, मिस्र, गाझा, तुर्की, ताजिकिस्तान को कुचलते हुए वह भारत की सीमा तक पहुंचा. अन्य राष्ट्रों को उसने जैसा जीता, उसी आसानी से भारत को जितने की उसकी कल्पना थी. भारत के अत्यंत समृध्द ‘मगध साम्राज्य’ को उसे जितना था.<br></p><p>लेकिन उसकी कल्पना और अपेक्षा के विपरीत, भारत में उसे कड़े विरोध का सामना करना पड़ा. आज के हमारे पंजाब प्रान्त को तो उसने जीत लिया, पर एक एक इंच भूमि उसे जी जान से लड़कर जीतनी पड़ी. मानो काले कभिन्न चट्टानों पर उसकी सेना सर फोड़ रही हो..! मगध के दर्शन भी न करते हुए, रक्तरंजित अवस्था में, विकल और विकट परिस्थिति में उसे वापस लौटना पड़ा. <br></p><p>विश्वविजयी कहलाने वाले, ‘सिकंदर महान’ की भारत में ऐसी दुर्गत क्यूँ हुई..?<br></p><p>उन दिनों भारत की उत्तर – पश्चिमी सीमा पर, सिन्धु नदी के दोनों तटों पर सौभूती, कठ, मालव, क्षुद्रक, अग्रश्रेणी, पट्टनप्रस्थ ऐसे अनेक छोटे छोटे गणराज्य थे. तक्षशिला जैसा राज्य भी था. सिकंदर के विशाल सेनासागर के सामने वह टिक न सके. किन्तु सिकंदर को प्रत्येक विजय की भरपूर कीमत चुकानी पड़ी. उसके सैनिक इतने परेशान हो गए, डर गए और थक गए कि व्यास (बियास) नदी के उस पार, ‘यौधेय गणों की बड़ी मजबूत सेना खड़ी हैं’, यह सुनकर ही उनके छक्के छुट गए. सिकंदर ने फिर भी आगे बढ़ने का निर्णय लिया तो मानो सेना में भूचाल आ गया. उसके सैनिक रोने लगे और उसे आगे जाने से रोकने लगे. यूनानी इतिहासकार प्लूटार्क लिखता हैं – ‘पोरस से युध्द करने के बाद सिकंदर की सेना का मनोबल पूरी तरह से टूट गया था. और इसीलिए सिकंदर को व्यास के उत्तर तट से ही वापस लौटना पड़ा.’ यूनानी  सेनानी और इतिहासकार डीयोडोरस ने भी भारतीय सैनिकों के वीरता एवम् एकजूटता के अनेक किस्से बयान किये हैं.<br></p><p>मालव और क्षुद्रक ये दो छोटे गणराज्य सिन्धु नदी के तट पर थे. दोनों में परंपरागत खानदानी दुश्मनी थी. लेकिन सिकंदर से युध्द करने के लिए उन्होंने अपना पिढीजात बैर भुला दिया. अब दोनों राज्यों के नागरिक इस बैर को कैसा भूलेंगे..? इसलिए दोनों गणराज्यों ने आपस में कन्यादान कर, दस हजार विवाह संपन्न किये. हिन्दुओं की एकजूटता का यह अनुपम उदहारण हैं...!<br></p><p>भारत से लौटते समय, सिकंदर की इतनी ज्यादा हानि हुई थी की दो वर्ष में ही, ईसा पूर्व ३२३ में उसकी मृत्यु हुई. सिकंदर के मरने के बाद, उसने जीता हुआ सारा पंजाब, पुनः स्वतंत्र हो गया. इस कालखंड में हिन्दू सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य का उदय यह भारतवर्ष को मजबूत करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण घटना थी. विदेशी आक्रान्ताओं का सशक्त प्रतिकार करने का यह क्रम अगले हजार – बारह सौ वर्ष निरंतर चलता रहा. भारतवर्ष का यह स्वर्णिम कालखंड था. <br></p><p>इस बीच दो तीन सौ वर्षों के बाद, सम्राट अशोक के अहिंसा तत्व के प्रचार – प्रसार के बाद, जब भारत की लड़ने की धार कुछ कम हुई तो डेमित्रीयस नामका सेनानी बेक्ट्रिया से जो निकला तो सीधे भारत के अयोध्या तक पहुचा. लेकिन कलिंग (उड़ीसा) के महाप्रतापी राजा खारवेल ने उसे इरान की सीमा तक खदेड़ दिया..!<br></p><p>शक और कुशाणों का आक्रमण तो यूनानियों से भी महाभयंकर था. ये लोग मतलब क्रूर कबाईली टोलियाँ थी. मारना, लूटना, तबाह करना इसी में इनको आनंद आता था. लेकिन भारतीय सेनानियों ने इस पाशविक आक्रमण को भी समाप्त किया. जब उत्तर के राजा निष्प्रभ होते थे, तब दक्षिण के राजा, भारतवर्ष को आक्रांताओं से बचाने सामने आते थे. सातवाहन साम्राज्य के गौतमीपुत्र सातकर्णी ने शकों से जबरदस्त युध्द कर उनके राजा नहमान को मार कर उनको खदेड़ दिया था. कुशाणों के आक्रमण के समय, उनका कडा मुकाबला हम नहीं कर सके. लेकिन सांस्कृतिक धरातल पर हम इतने मजबूत थे, की सारे कुशाण हिन्दू हो गए. वैदिक आचरण करने लगे. संस्कृत बोलने – लिखने लगे. उनके राजा कनिष्क ने बौध्द धर्म का स्वीकार किया.<br></p><p>जो हाल शक, कुशाणों का, वही हाल किया हूणों का भी. मध्य आशिया के ये सारे असंस्कृत, क्रूर कबाईली लोग. इनसे डरकर चीन ने अपनी ऐतिहासिक दीवार खड़ी की. लेकिन भारत के सेनानियों ने उनका भी निःपात किया. मालवा के राजा यशोवर्मा ने अन्य हिन्दू राजाओं को संगठित कर हूणों को परास्त किया.<br></p><p>यह पूरा विजय का इतिहास हैं. संगठित हिन्दू शक्ति के यशस्वी प्रकटीकरण का इतिहास हैं. यह हिन्दुओं की विजिगीषु वृत्ति का इतिहास हैं.</p><p>- प्रशांत पोल</p>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[हिंदुत्व / २  : संगठित हिन्दू समाज]]></title><description><![CDATA[कल हमने ‘हिन्दू’ इस शब्द की व्याख्या करने का प्रयास किया. किन्तु मन में प्रश्न यह उठता हैं, कि यह हिन्दू समाज कभी ‘समाज’ के रूप में भी था..? संगठित था..?
]]></description><link>https://prashantpole.com/hindutwa-2-sangathithindusamaj/</link><guid isPermaLink="false">6086c8a1b9f9d40fc07b17cc</guid><category><![CDATA[Hindu]]></category><category><![CDATA[Hindu Mandir]]></category><category><![CDATA[Hindu Dharm]]></category><category><![CDATA[Whom we can call Hindu]]></category><category><![CDATA[What is hinduism]]></category><category><![CDATA[Hindutwa]]></category><category><![CDATA[Who is a Hindu]]></category><category><![CDATA[Hindu Samaj]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Thu, 26 Mar 2020 14:04:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/90644438_10212536704492842_1544169312758005760_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/90644438_10212536704492842_1544169312758005760_n-1.jpg" alt="हिंदुत्व / २  : संगठित हिन्दू समाज"><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/90644438_10212536704492842_1544169312758005760_n.jpg" class="kg-image" alt="हिंदुत्व / २  : संगठित हिन्दू समाज"></figure><p>- प्रशांत पोल <br></p><p>कल हमने ‘हिन्दू’ इस शब्द की व्याख्या करने का प्रयास किया. किन्तु मन में प्रश्न यह उठता हैं, कि यह हिन्दू समाज कभी ‘समाज’ के रूप में भी था..? संगठित था..?<br></p><p>आज के समाजशास्त्रियों का मानना हैं, कि हिन्दुओं को ‘हिन्दू’ इस नाते संगठित करना अत्यधिक कठिन हैं. आप उन्हें जातियों के आधार पर तो संगठित कर सकते हैं – अग्रवाल समाज, क्षत्रिय समाज, कायस्थ समाज, कुर्मी समाज, पटेल समाज, कान्यकुब्ज ब्राह्मण, सरयुपारिन ब्राह्मण आदि. आप उन्हें भाषिक समूह के रूप में भी संगठित कर सकते हैं – तामिल, मराठी, कन्नड़, बंगला आदि.. किन्तु इन सब के ऊपर उठकर इस समाज को ‘हिन्दू’ इस नाते से खड़ा करना असंभव की श्रेणी में आता हैं.<br></p><p>किसी हिन्दू के कष्ट देखकर, या हिन्दू समाज की अवमानना पर, अवहेलना पर यह समाज क्रोधित हुआ हैं, खौल उठा हैं ऐसा भी नहीं दिखता. यदि ऐसा होता, तो १९७१ में पाकिस्तान ने पुर्व पाकिस्तान (आज के बंगला देश) में दो लाख से ज्यादा हिन्दुओंका पाशविक पध्दति से वंशविच्छेद (genocide) किया था, अमानुष हत्याएं की थी, अगणित बलात्कार किये थे, तब हिन्दू समाज के खौलने का कोई उदाहरण सामने नहीं आया था. कश्मीर की घाटियों से हिन्दुओं को मार मार कर भगाया गया. तब भी देश का हिन्दू समाज कमोबेश सोया रहा. हिन्दुओं के आराध्य भगवान् श्रीराम अभी अभी तक टाट और बांस के मंदिर में कैद था. तब भी हिन्दू समाज न जागृत दिखता हैं, और न ही आक्रोशित..!  <br></p><p>तो क्या, हिन्दू समाज इतिहास में भी ऐसा ही था..?<br></p><p>स्पष्ट उत्तर हैं – नहीं.<br></p><p>इतिहास में हिन्दू समाज, ‘समाज’ के रूप में एक था. समरस था और संगठित भी था. <br></p><p>जी हां. यही हिन्दू समाज की विशेषता थी. प्रख्यात चिंतक डॉ. पु. ग. सहस्त्रबुध्दे ने इसका सुन्दर वर्णन किया हैं. समाज को संगठित करने के आयाम क्या होते हैं..? अगर ‘धर्म’ का आधार ले, तो सारा यूरोप मूलतः ख्रिश्चन था. उसे तो एक ‘समाज’, एक ‘राष्ट्र’ के रूप में खड़ा होना चाहिए था. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. दुनिया के सबसे बड़े युध्द तो यूरोप की धरती पर हे लड़े गए. और आज भी यूरोप एक राष्ट्र नहीं हैं. हमारा भारतवर्ष यूरोप जैसा ही एक खंड हैं. यदि हमारे पूर्वजों ने समाज को संगठित न रखा होता, तो शायद आज हम भी यूरोप जैसे ही अनेक राष्ट्रों में बटें होते.<br></p><p>अरब राष्ट्रों का आधार तो एक धर्म हैं ही, उनकी भाषा, आचार – विचार पध्दति भी समान हैं. लेकिन फिर भी वे अनेक राष्ट्र हैं. अफगानिस्तान से मोरोक्को तक मुस्लिम साम्राज्य अनेक शताब्दियों से हैं, लेकिन यह सारा भूप्रदेश एक राष्ट्र के रूप में किसी के स्वप्न में भी अस्तित्व में नहीं आया. प्राचीन काल में चीन और वर्तमान में अमेरिका ने ही इस प्रकार से एक राष्ट्र के रूप में खड़े होने में सफलता प्राप्त की हैं. इसके आधार पर, हमारे पूर्वजों का यश कितना दुर्लभ था, इसका अंदाज हम लगा सकते हैं.<br></p><p>हजारो वर्ष पूर्व हमारे पूर्वजों ने इस ‘राष्ट्र’ को खड़ा करने के लिए कुछ बाते तय की थी –</p><ol><li>इस राष्ट्र में रहने वाला संपूर्ण समाज एकरूप, एकरस होना चाहिये, यह उनका दृढनिश्चय था.</li><li>इस ध्येय की आड़ में वर्ण, वंश, आचार पध्दति नहीं आएगी यह उन्होंने सुनिश्चित किया था.</li><li>इसलिये सहिष्णुता और संग्राहकता यह दोनों दुर्लभ गुण भारतियों में विकसित हुए.</li></ol><p>- प्रशांत पोल</p>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[हिंदुत्व / १ : हम हिन्दू किसे कहेंगे..?]]></title><description><![CDATA[हम हिन्दू किसे कहेंगे..?
जो गीता जानता हो, रामायण – महाभारत जानता हो, वह..?
तो फिर ऐसे अनेक हैं, 
जो ना तो गीता जानते हैं, और ना ही रामायण – महाभारत.
फिर भी वह हिन्दू हैं..!
]]></description><link>https://prashantpole.com/hm-hinduu-kise-khenge/</link><guid isPermaLink="false">6086c684b9f9d40fc07b17a7</guid><category><![CDATA[Hindu]]></category><category><![CDATA[Hindutwa]]></category><category><![CDATA[Who is a Hindu]]></category><category><![CDATA[Whom we can call Hindu]]></category><category><![CDATA[What is hinduism]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Wed, 25 Mar 2020 13:53:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/90262468_10212529737278666_7039838116999331840_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/90262468_10212529737278666_7039838116999331840_n.jpg" class="kg-image" alt="हिंदुत्व / १ : हम हिन्दू किसे कहेंगे..?"></figure><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/90262468_10212529737278666_7039838116999331840_n-1.jpg" alt="हिंदुत्व / १ : हम हिन्दू किसे कहेंगे..?"><p></p><p>- प्रशांत पोल <br></p><p>हम हिन्दू किसे कहेंगे..?</p><p>जो गीता जानता हो, रामायण – महाभारत जानता हो, वह..?</p><p>तो फिर ऐसे अनेक हैं,</p><p>जो ना तो गीता जानते हैं, और ना ही रामायण – महाभारत.</p><p>फिर भी वह हिन्दू हैं..!</p><p>फिर जो रोज भगवान् की पूजा करते हैं, वे हिन्दू हैं..?</p><p>वैसे भी नहीं.</p><p>हम में से अनेक ऐसे हैं,</p><p>जो कभी कभार ही मंदिर जाते हैं..</p><p>कभी कभार ही पूजा करते हैं.</p><p>लेकिन कुछ ऐसे भी हैं,</p><p>जो भगवान् को ही नहीं मानते.</p><p>फिर मंदिर जाना और पूजा करना तो बहुत दूर की बात हैं.</p><p>वे सारे हिन्दू हैं..!</p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/04/90348701_10212529737838680_860256149520252928_n.jpg" class="kg-image" alt="हिंदुत्व / १ : हम हिन्दू किसे कहेंगे..?"></figure><p>तो क्या भारत में रहने वाला ही हिन्दू हैं..?</p><p>ऐसा भी नहीं कह सकते.</p><p>बंगला देश के १५% नागरिक हिन्दू कहलाते हैं.</p><p>उधर दूर फिजी में या सूरीनाम में या मॉरिशस में...</p><p>हिन्दू सत्ता में बैठे हैं.</p><p>वहां के प्रधानमंत्री भी बने हैं.</p><p>इंडोनेशिया के बाली में भी हिन्दू रहते हैं.</p><p>तो फिर हिन्दू किसे कहेंगे हम..?</p><p>बड़ा ही संभ्रभ (कंफ्यूजन) निर्माण हो रहा हैं.</p><p>सावरकर जी ने ‘हिन्दू’ की बड़ी सरल व्याख्या की हैं –</p><p>‘असिंधू सिन्धु पर्यन्ता, यस्य भारत भूमिका I</p><p>पितृभू: पुण्यभूश्चैव सवै हिन्दुरिति स्मृतः II’</p><p>सिन्धु नदी से लेकर, हिन्द महासागर पर्यंत फैली हुई</p><p>भूमि को जो व्यक्ति अपनी पितृभूमि (पूर्वजों की भूमि)</p><p>व पुण्यभूमि मानता हैं,</p><p>वह हिन्दू हैं..!<br></p><p>अर्थात किसी भी मत / पंथ को मानने वाली,</p><p>साथ ही इस देश को अपना मानने वाली व्यक्ति,</p><p>हिन्दू हैं..!</p><p>दुसरे किसी भी चश्मे से हम इसे देखेंगे,</p><p>तो हतप्रभ रह जायेंगे.</p><p>दुसरे किसी भी धर्म में इस प्रकार की परिभाषा नहीं हैं.</p><p>वहां पर, एक धर्मग्रंथ हैं, एक ईश्वर हैं.</p><p>हिंदुत्व की व्याख्या में यह सब नहीं आता.</p><p>आप आस्तिक हैं, तो हिन्दू हैं,</p><p>आप नास्तिक हैं, तो भी हिन्दू हैं.</p><p>अर्थात हिंदुत्व यह धर्म हैं ही नहीं.</p><p>कारण हम जिसे धर्म कहते हैं,</p><p>वह अंग्रेजी religion से बिलकुल भिन्न हैं.</p><p>हिंदुत्व तो हमारी जीवनशैली हैं.</p><p>हमारा कोई एक धर्मग्रंथ नहीं हैं.</p><p>कोई एक भगवान भी नहीं हैं.</p><p>पूजा की कोई एक पध्दति भी नहीं हैं.</p><p>जो लोग इस्लाम या ख्रिश्चन धर्म मानते हो,</p><p>उनके लिए यह समझ के बाहर की चीज हैं.</p><p>धर्म ऐसा होता हैं..?</p><p>इसका कारण हैं,</p><p>हमारा हिंदुत्व हमारी जीवनशैली हैं.</p><p>हमारे मूल्य हैं.</p><p>जिसे अंग्रेजी में रिलिजन कहते हैं,</p><p>वह हमारा ‘धर्म’ नहीं हैं.</p><p>यदि ऐसा हैं, तो फिर हमारा ‘रिलिजन’ कौनसा हैं..?</p><p>हिंदुत्व यदि जीवनशैली हैं,</p><p>तो हमारी पूजा पध्दति को हम क्या कहे..?</p><p>हम इसे ‘सनातन’ कह सकते हैं. ‘वैदिक’ कह सकते हैं.</p><p>हम इसे ‘हिन्दू’ भी कह सकते हैं.</p><p>सदियों से इस विशाल भरतभूमि के</p><p>इतिहास को, सभ्यता को, संस्कृति को</p><p>हिन्दू समाज समृध्द करता आया हैं...</p><p>हिंदुत्व की प्राचीन, ऐतिहासिक धरोहर हैं..</p><p>परंपरा हैं..</p><p>हमें तो बस,</p><p>इस परंपरा को अक्षुण्ण बनाए रखना हैं..!</p><p>- प्रशांत पोल</p>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[एक जिंदादिल मुख्यमंत्री – देवेन्द्र]]></title><description><![CDATA[<p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2020/11/10532616_10201731268483695_5833824601406438274_o.jpg" class="kg-image"></figure><p>देवेन्द्र की किशोरावस्था से मैं उन्हें जानता हूँ. मेरे विवाह में देवेन्द्र और उनकी उर्जावान टीम ने जिस प्रकार से समारोह में रौनक</p>]]></description><link>https://prashantpole.com/untitled-2/</link><guid isPermaLink="false">5fabe8e6fcf80c14f062543f</guid><category><![CDATA[Devendra Fadnavis]]></category><category><![CDATA[Prashant Pole]]></category><category><![CDATA[CM]]></category><category><![CDATA[Maharashtra]]></category><category><![CDATA[Devendra]]></category><category><![CDATA[Fadnavis]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Sat, 14 Sep 2019 13:43:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2020/12/83915626_10212215670627196_4621916858159726592_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<img src="https://prashantpole.com/content/images/2020/12/83915626_10212215670627196_4621916858159726592_n-1.jpg" alt="एक जिंदादिल मुख्यमंत्री – देवेन्द्र"><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2020/11/10532616_10201731268483695_5833824601406438274_o.jpg" class="kg-image" alt="एक जिंदादिल मुख्यमंत्री – देवेन्द्र"></figure><p>देवेन्द्र की किशोरावस्था से मैं उन्हें जानता हूँ. मेरे विवाह में देवेन्द्र और उनकी उर्जावान टीम ने जिस प्रकार से समारोह में रौनक बनाएं रखी थी, वो मैंने देखी थी. विवाह समारोह में उनसे परिचय होने का ख़ास कोई कारण भी नहीं था. लेकिन जबरदस्त उत्साह से लबालब लड़कों का नेतृत्व वह कर रहे थे, यह मैंने देखा था. वे मेरे पत्नी, सुमेधा, के चचेरे भाई हैं. पारिवारिक तानाबाना अत्यधिक मजबूत हैं. <br></p><p>विवाह के बाद नागपुर जाने के कई मौके आए. देवेन्द्र से लगभग हर बार भेंट होती थी. उन दिनों के देवेन्द्र की प्रतिमा, मेरे मन-मष्तिष्क पर, एक नटखट और चुलबुले युवा के रूप में बनी हैं. हिंदुत्व पर प्रखर श्रध्दा, सतत कुछ नया करने की चाह तथा देश और समाज की परिस्थिति का आंकलन करते रहना, यह मैंने देवेन्द्र के स्वभाव में देखा हैं.<br></p><p>उन दिनों देवेन्द्र पहले विद्यार्थी परिषद् में और बाद में पढ़ाई समाप्त होने के पश्चात युवा मोर्चे में सक्रीय रहते थे. मेरे हर बार के प्रवास में उनसे कुछ नया सुनने को जरुर मिलता था. उनका नगरसेवक (पार्षद) से महापौर, महापौर से आमदार (विधायक), फिर भाजपा के प्रदेशाध्यक्ष और बाद में मुख्यमंत्री तक का प्रवास मैंने देखा हैं..!<br></p><p>देवेन्द्र, महाराष्ट्र के पहले ‘मेयर-इन-काउंसिलिंग’ के  महापौर हैं. उन्होंने महापौर के रहते अनेक नई कल्पनाएं प्रत्यक्ष में लाने का प्रयास किया. पानी की खोज में, सूखे पड़े कन्हान नदी में, अधिकारियों के साथ मीलों चलने वाले देवेन्द्र को भी मैंने देखा हैं..!<br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2020/11/83915626_10212215670627196_4621916858159726592_n.jpg" class="kg-image" alt="एक जिंदादिल मुख्यमंत्री – देवेन्द्र"></figure><p>लगभग पंद्रह वर्ष पहले, कुछ ऐसा संयोग बन आया था, जब मैं और देवेन्द्र, दोनों अलग अलग कार्य से, किन्तु एक ही समय बर्लिन में थे. देवेन्द्र वहां महानगरीय व्यवस्थापन से संबंधित एक एडवांस कोर्स करने आये थे. उन दिनों शनिवार / रविवार को, बर्लिन की सड़कों पर हम खूब घूमते थे. देवेन्द्र में हमेशा एक बालक छुपा रहता हैं, जो उसे हरदम जिंदादिल बनाएं रखता हैं. ‘देवेन्द्र एक पारिवारिक व्यक्ति हैं’, यह पढकर अनेकों को आश्चर्य होगा. किन्तु यह सच हैं. परिवार के बच्चों के साथ देवेन्द्र जिस प्रकार से घुल-मिलकर बातें करते हैं, उसे देखकर ऐसा लगता हैं की दोस्त बात कर रहे हैं..!<br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2020/11/18446890_10206681096866311_7215289066339971614_n.jpg" class="kg-image" alt="एक जिंदादिल मुख्यमंत्री – देवेन्द्र"></figure><p>देवेन्द्र ने राज्यव्यवस्थापन के बारे में गहरी सोच विकसित की हैं. देश और विदेश का अनुभव उनके साथ हैं. वह जमीनी कार्यकर्ता हैं. नगरसेवक से मुख्यमंत्री तक उनका यह प्रवास, सीढी-दर-सीढी हुआ हैं. और इसीलिए देवेन्द्र में अपार संभावनाएं छिपी दिखती हैं..!!</p><p>- प्रशांत पोल</p>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[दिग्गी राजा, इतना गिरोगे..?]]></title><description><![CDATA[जिस ‘रोना विल्सन’ के लैपटॉप के हार्डडिस्क में दिग्विजय सिंह का मोबाईल नंबर मिला हैं, वो रोना विल्सन कौन हैं..?]]></description><link>https://prashantpole.com/article-about-digvijay-singh/</link><guid isPermaLink="false">60e803236319c914703df4ac</guid><category><![CDATA[Digvijay Singh]]></category><category><![CDATA[Diggi Raja]]></category><category><![CDATA[Congress]]></category><category><![CDATA[Currupt Politician]]></category><category><![CDATA[Naxal]]></category><category><![CDATA[Naxal Attack]]></category><category><![CDATA[Terrorists]]></category><category><![CDATA[Islamic Terrorism]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Mon, 19 Nov 2018 08:04:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/46486336_10209772611872254_8100009901633306624_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/46486336_10209772611872254_8100009901633306624_n.jpg" class="kg-image" alt="दिग्गी राजा, इतना गिरोगे..?"></figure><ul><li>प्रशांत पोळ <br></li></ul><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/46486336_10209772611872254_8100009901633306624_n-1.jpg" alt="दिग्गी राजा, इतना गिरोगे..?"><p>मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह का ‘नक्सल प्रेम’ नया नहीं हैं. और न ही यह अभी सामने आया हैं.<br></p><p>जिस ‘रोना विल्सन’ के लैपटॉप के हार्डडिस्क में दिग्विजय सिंह का मोबाईल नंबर मिला हैं, वो रोना विल्सन कौन हैं..?<br></p><p>अटल जी की सरकार के समय, सन २००१ में संसद पर कातिलाना आतंकवादी हमला हुआ था. उस हमले का मास्टर माइंड था, ‘अफजल गुरु’. उस अफजल गुरु का ख़ास मित्र था, एस ए आर गीलानी. इस गीलानी को जेल से छुडाने के लिए, इस रोना विल्सन ने आसमान सर पर उठा लिया था. मूलतः केरल का रोना विल्सन, जे एन यु में पढ़ा हैं, और अतिवादी कम्युनिस्ट पार्टी, अर्थात ‘कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ़ इंडिया – माओइस्ट’ का कार्यकर्ता हैं. <br></p><p>इस रोना विल्सन के लैपटॉप में वांटेड नक्सली नेता, मिलिंद तेलतुन्बड़े का पत्र मिला हैं. इस पत्र में वो लिखता हैं, ‘कई कांग्रेसी नेता हमारी मदत को तैयार हैं.’ इस आधार पर जब पुलिस ने गिरफ्तार किये गए माओवादी (अर्बन नक्सल) नेता, प्रकाश अर्थात रितुपन गोस्वामी और सुरेन्द्र गाडलिंग के मोबाईल नंबर के रिकॉर्ड की जांच की, तो पाया की इन नंबरों से एक ‘विशेष’ नंबर पर कई बार बातचीत हुई हैं. यह ‘विशेष’ नंबर दिग्विजय सिंह का निकला, जो कांग्रेस की वेब साईट पर भी मौजूद था. आज दिग्विजय सिंह ने भी उस नंबर को नकारा नहीं हैं. वे नकार भी नहीं सकते. यह उन्हीका नंबर हैं, यह दुनिया जानती हैं..!<br></p><p>अर्थात बात बिलकुल साफ़ हैं... हमारे दिग्गी राजा इस अतिवादी, आतंकवादी नक्सलियों के संपर्क में थे...!<br></p><p>दिग्विजय सिंह का नक्सली प्रेम छुपता भी नहीं हैं. भाजपा को हराने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए, दिग्गी राजा जाने जाते हैं. याद कीजिये, कुछ वर्ष पहले, असम चुनाव को जितने के लिए इन्ही दिग्गी राजा ने पत्रकार परिषद् में तय कर के ओसामा बिन लादेन को ‘ओसामा जी’ और ‘लादेन जी’ कहा था.</p><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/46486365_10209772613632298_8145522557672488960_n.jpg" class="kg-image" alt="दिग्गी राजा, इतना गिरोगे..?"></figure><p>दिसंबर २०१४ के झारखंड चुनाव में प्रचार करते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा था, “भाजपा को हराने के लिए नक्सली, कांग्रेस का साथ दे.” उन्होंने नक्सलियों को कांग्रेस में शामिल होने का न्यौता भी दिया था. <br></p><p>मई २०१३ में दिग्विजय सिंह ने कहा था, ‘नक्सली आतंकी नहीं, भ्रमित हैं..’<br></p><p>२५ सितंबर, २०१७ को कॉमरेड प्रकाश की ओर से कॉमरेड सुरेन्द्र को भेजे गए पत्र में लिखा हैं, “कांग्रेस नेता इस पूरी योजना में हमारा साथ निभाने उत्सुक हैं और वे आने वाले आंदोलनों के लिए, जब भी जरूरत पड़ेगी, हमें फंड करने को तैयार हैं. इस बारे में आप हमारे दोस्त से 99102..... पर संपर्क कर सकते हैं.” यही नंबर दिग्विजय सिंह का हैं..!<br></p><p>इसकी गंभीरता समझ रहे हैं हम..? इस प्रदेश का दो बार मुख्यमंत्री रहा व्यक्ति, सत्ता पाने के लिए, देश को तोड़ने वाले लोगो की मदद के लिए तैयार हैं...! देश के टुकडे टुकडे करने वाले लोगों के साथ मिल कर लोकतंत्र की हत्या करने की सोचता हैं..!<br></p><p>सोचिये.. यह झलक मात्र हैं.!<br></p><p>कांग्रेस के हाथों सत्ता देने का अर्थ समझ रहे हैं ना आप..?</p><ul><li>प्रशांत पोळ</li></ul>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[क्या हो गया हैं, जबलपुर की प्रबुद्धता को..?]]></title><description><![CDATA[आज प्रातः, जब जबलपुर नींद की आगोश से बाहर आ रहा था, नर्मदा माई के भक्त, ग्वारीघाट में स्नान के लिए जा रहे थे, तब ग्वारीघाट के झंडा चौक पर बवाल मचा हुआ था. उस चौक से, ग्वारिघाट पुलिस थाने तक पथराव हो रहा था. पुलिस के वाहनों को आग लगाई जा रही थी. ]]></description><link>https://prashantpole.com/kyaa-ho-gyaa-hain-jblpur-kii-prbuddhtaa-ko/</link><guid isPermaLink="false">60e6f4546319c914703df467</guid><category><![CDATA[Jabalpur]]></category><category><![CDATA[Navratri]]></category><category><![CDATA[Jabalpur Navratri]]></category><category><![CDATA[Mahakali]]></category><category><![CDATA[Jabalpur News]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Tue, 23 Oct 2018 12:49:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/44624663_10209636026937716_5713592816320380928_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/44624663_10209636026937716_5713592816320380928_n-1.jpg" alt="क्या हो गया हैं, जबलपुर की प्रबुद्धता को..?"><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/44624663_10209636026937716_5713592816320380928_n.jpg" class="kg-image" alt="क्या हो गया हैं, जबलपुर की प्रबुद्धता को..?"></figure><p>आज प्रातः, जब जबलपुर नींद की आगोश से बाहर आ रहा था, नर्मदा माई के भक्त, ग्वारीघाट में स्नान के लिए जा रहे थे, तब ग्वारीघाट के झंडा चौक पर बवाल मचा हुआ था. उस चौक से, ग्वारिघाट पुलिस थाने तक पथराव हो रहा था. पुलिस के वाहनों को आग लगाई जा रही थी. <br></p><p>कारण था, लटकारी पड़ाव की महाकाली के विसर्जन जुलूस को पुलिस, नर्मदा माई में जाने से रोक रही थी. नर्मदा में प्रतिमाओं के विसर्जन पर न्यायालय के आदेश द्वारा (पर्यावरण को दृष्टिगत रखते हुए), प्रतिबंध हैं. लेकिन सतरा घंटे से विसर्जन जुलूस में चल रहे लोगों ने इसे नहीं माना, और उन्होंने प्रतिमा को नर्मदा नदी की तरफ मोड़ा. पुलिस ने जब इसे रोका, तो कार्यकर्ताओं ने पथराव चालू किया. और बवाल मच गया..!<br></p><p>कई प्रश्न खड़े होते हैं, इस प्रकरण से. नर्मदा के दक्षिण तट पर दशहरा दिनांक १८ अक्तूबर को मनाया गया. उत्तर तट पर, अर्थात समूचे उत्तर और पूर्व भारत में दशहरा १९ अक्तूबर को संपन्न हुआ. विधि – विधान से प्रतिष्ठित अधिकांश प्रतिमाएं दिनांक १९ को ही विसर्जित हुई. गढ़ाफाटक की ऐतिहासिक महाकाली भी १९ अक्तूबर की गोधुली बेला में विसर्जन को चल पडी थी. भीड़ को देखते हुए कुछ प्रतिमाएं और कुछ विसर्जन जुलूस २० अक्तूबर को भी निकले. लेकिन पड़ाव की महाकाली के कार्यकर्ताओं द्वारा २२ अक्तूबर की शाम को विसर्जन जुलूस प्रारंभ करना यह समझ के बाहर हैं.<br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/44579031_10209636027377727_4842577215377899520_n.jpg" class="kg-image" alt="क्या हो गया हैं, जबलपुर की प्रबुद्धता को..?"></figure><p>जबलपुर शहर की आबोहवा में धार्मिकता हैं. यह नगरी मातारानी की भक्त हैं. नवरात्रि इस शहर में अत्यंत श्रध्दा के साथ मनाई जाती हैं. हजारो भक्त उपवास रखते हैं, व्रत रखते हैं. हमारे धर्म ने पूजा विधि के कुछ यम – नियम, विधि – विधान बनाए हैं. पूजा विधि में पवित्रता बनाएं रखने के लिए यह आवश्यक हैं. ऐसे में नौ दिनों के लिए आयी हुई मातारानी को चौदह और पन्द्रह दिनों तक बिठाएं रखना यह कहा की धार्मिकता हैं..? यह विकृत मानसिकता हैं. यह अधर्म हैं. और इसीलिए पड़ाव की महाकाली के कार्यकर्ताओं ने जो कुछ उपद्रव किया, यह जबलपुर की प्रतिमा पर लांछन हैं..!<br></p><p>मुझे समझ में नहीं आ रहा हैं, जबलपुर की वह गौरवशाली, संस्कारक्षम, पावित्र्य से भरपूर नवरात्रि कहां गयी..? वो देश में मशहूर दशहरा कहां गयां..? सुपर मार्केट की देवी, सुनरहाई – नुनहाई की नेतृत्व करने वाली दुर्गा समितियां, वो गोविन्दगंज रामलीला के प्रबुध्द कार्यकर्ता, शकर घी भण्डार की देवी के कार्यकर्ता, अनेकों देवी के पंडालों में रतजगा करने वाले कार्यकर्त्ता, उनको अपने बुजुर्गियत अंदाज में सीधे रास्ते पर चलाने वाले त्रिभुवनदास मालपानी जी, भगवतीधर बाजपाई जी, शहर के अन्य गणमान्य नागरिक, मित्रसंघ जैसी सांस्कृतिक संस्था... क्या इनमे से किसी का अंकुश नहीं रहा हैं, ऐसे दुर्गा मंडलों पर..? </p><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/44728444_10209636027537731_4573632689789206528_n.jpg" class="kg-image" alt="क्या हो गया हैं, जबलपुर की प्रबुद्धता को..?"></figure><p>धर्म को गलत दिशा में ले जाने वाले ये जबलपुर के शुंभ – निशुंभ हैं. यही महिषासुर हैं, और यही चंड – मुंड हैं...! जबलपुर की सज्जन शक्ति से बिनती हैं, अनुरोध हैं, की ऐसे तत्वों पर अंकुश रखे. जबलपुर के दुर्गोत्सव की उज्ज्वल प्रतिमा को अक्षुण्ण बनाएं रखे..!</p><ul><li>प्रशांत पोळ</li></ul>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[मेरा बुखार...!]]></title><description><![CDATA[शनिवार, दिनांक ८ सितंबर को मुझे पुणे से डोंबिवली जाना था. पिछली रात से शरीर में बुखार था, साथ में खांसी भी. बिटिया मना कर रही थी. मेरा भी मन कर गया एक बार, की नहीं जाऊ. किन्तु जाना आवश्यक था. हिम्मत की. प्रातः साढ़े चार बजे उठकर मैं डोंबिवली गया.]]></description><link>https://prashantpole.com/langda-bukhar/</link><guid isPermaLink="false">60ec494c6319c914703df546</guid><category><![CDATA[Fever]]></category><category><![CDATA[Langada Bukhar]]></category><category><![CDATA[Prashant Pole]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Thu, 13 Sep 2018 13:53:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/bodyHappenFever-1006577818-770x553-650x428.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/bodyHappenFever-1006577818-770x553-650x428.jpg" alt="मेरा बुखार...!"><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/41721381_10209421652978501_9175931872507592704_n.jpg" class="kg-image" alt="मेरा बुखार...!"></figure><p>शनिवार, दिनांक ८ सितंबर को मुझे पुणे से डोंबिवली जाना था. पिछली रात से शरीर में बुखार था, साथ में खांसी भी. बिटिया मना कर रही थी. मेरा भी मन कर गया एक बार, की नहीं जाऊ. किन्तु जाना आवश्यक था. हिम्मत की. प्रातः साढ़े चार बजे उठकर मैं डोंबिवली गया. बुखार और खांसी के साथ मैंने वहां के सारे काम निपटाए. दुर्भाग्य से, ट्रेफिक जाम के कारण मेरी सह्याद्री एक्सप्रेस छुट गयी. फिर महालक्ष्मी लेकर रात्री में एक बजे के लगभग घर पर पहुंचा. कैसा, बस वो में ही जानता हूं.<br></p><p>रविवार का दिन तो मानो मैंने बेहोशी में ही बिताया. सुध-बुध बहुत ज्यादा नहीं थी. जबरदस्त बुखार था. लेकिन एक पक्का था, दवाई तो मैं मेरे जबलपुर के मित्र डॉ. नितिन अडगांवकर की ही लूंगा. सुमेधा ने डॉ से बात करके दवाई लिखवाई. पुणे के घर में अकेली बिटिया. लेकिन उसने मां की दृढ़ता और ममता से सेवा की. <br></p><p>अगले दो दिन बहुत ज्यादा कष्ट में बीते. लेटने की स्थिति से उठने की स्थिति में आना भी बहुत कठीन लग रहा था. शरीर की सारी शक्ति मानो छोड़ गयी हो. किन्तु धीरे धीरे दवाई काम कर रही थी. सोमवार की रात्री तक बुखार तो उतर गया था. धीरे धीरे शरीर में, खाने-पीने के कारण, ताकत भी आ रही थी. लेकिन एक नई मुसीबत, फिरसे चालु हो गयी. खांसी..!</p><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/41658988_10209421654018527_2925680710708625408_n.jpg" class="kg-image" alt="मेरा बुखार...!"></figure><p>मंगलवार उसी खांसी में गया. बस, मैं ख़ास ही रहा था. मैंने मुंह खोला, और खासी. बोलना, खाना-पीना, सोचना.. सब कुछ लगभग बंद. जबलपुर जाने की जल्दी थी. बिटिया ने हिम्मत दी. सुबह साढ़े तीन बजे प्रसेनजीत ने एअरपोर्ट पर छोड़ा. हैदराबाद होते हुए, हम कल दोपहर को जबलपुर पहुचे. डॉक्टर नितिन अडगांवकर को दिखाया. अभी तक तो उन्होंने फोन पर दवाई बताई थी. अब प्रत्यक्ष देख कर दवाई दी. कल रात से निश्चित आराम हैं...<br></p><p>मैंने डॉक्टर से इस बिमारी का नाम पूंछा. सब लोग इसे चिकन गुनिया जैसी बिमारी बता रहे थे. डॉक्टर ने बताया, इसे ‘लंगड़ा बुखार’ कहते हैं..! घर आकर मैंने इस ‘लंगडा बुखार’ की खोजबीन की. तो पता चला यह अधिकतर पशुओंमे होता हैं. जैसे गाय आदि...<br></p><p>तो यह मुझे क्यूँ हुआ..? मैं सोच में पड गया.<br></p><p>अचानक ध्यान में आया, इसका उत्तर तो मेरे नाम में हैं....</p><p>(मराठी में पोळ का अर्थ होता हैं – बैल....!)<br></p><p>इन चार – पाच दिनों में जिन्होंने भी मुझे फोन किये, मैं किसीका भी उत्तर नहीं दे सका. क्षमा चाहता हूं. अभी भी ठीक से बोलने की परिस्थिति में नहीं हूं. ठीक होते ही, उन सभी के कॉल लौटाऊँगा, जिन्होंने इन दिनों में फोन किये थे. क्षमस्व..!</p>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[वेगड़ जी का जाना...]]></title><description><![CDATA[छह जुलाई का दिन बड़ा त्रासदी भरा रहा. दोपहर को वेगड़ जी के जाने का समाचार मिला, और कुछ ही घंटो बाद फोन आया की मेरे बड़े जीजाजी नहीं रहे..! एक ही दिन दो जबरदस्त आघात...]]></description><link>https://prashantpole.com/amrit-lal-vegad-article/</link><guid isPermaLink="false">60e805fb6319c914703df4ef</guid><category><![CDATA[Amritlal vegad]]></category><category><![CDATA[Jabalpur]]></category><category><![CDATA[Amrutasya Narmada]]></category><category><![CDATA[Amritlal vegad death news]]></category><category><![CDATA[Prashant Pole]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Sat, 07 Jul 2018 08:16:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/36728170_10209068864279004_8092523692032000000_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/36728170_10209068864279004_8092523692032000000_n.jpg" class="kg-image" alt="वेगड़ जी का जाना..."></figure><ul><li>प्रशांत पोळ <br></li></ul><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/36728170_10209068864279004_8092523692032000000_n-1.jpg" alt="वेगड़ जी का जाना..."><p>छह जुलाई का दिन बड़ा त्रासदी भरा रहा. दोपहर को वेगड़ जी के जाने का समाचार मिला, और कुछ ही घंटो बाद फोन आया की मेरे बड़े जीजाजी नहीं रहे..! एक ही दिन दो जबरदस्त आघात...<br></p><p>१९८३ का दिसंबर या जनवरी का महीना. मेरे जिगरी दोस्त के बड़े भाई का विवाह था, भोपाल में. बाराती बन के हम भी गए थे. सुबह थोड़ा समय था, सोचा भारत भवन घूम के आते हैं. हम दो-तीन दोस्त भारत भवन में गए. वहां सैयद हैदर रझा जी के चित्रों की प्रदर्शनी लगी थी. चित्र देखकर आनंद आ रहा था. पता चला, प्रत्यक्ष रझा साहब वहां उपस्थित हैं. मैंने दोस्तों से कहा, ‘चलो, मिलते हैं उनसे.’ अस्सी के दशक के प्रारंभ में रझा साहब का आभा मंडल, उनका फ़्रांस में रहना, यह अपने आप में चर्चा के विषय होते थे. हम मिले. ऊँचे पूरे, गोरे, प्रसन्न व्यक्तित्व के रझा साहब को मैंने चित्रों से जो अनुभूति हुई, वह बताई. एलीमेंट्री और इंटर की चित्रकला परीक्षा पास करना (वो भी इंटर मात्र ‘सी’ ग्रेड में) यही मेरा ‘क्वालिफिकेशन’ था. शायद रझा जी को मेरा, उनके चित्रों में समरस होना भा गया, या उनकी तारीफ़ भा गयी, पता नहीं. पर उन्होंने हमसे बहुत अच्छे से बात की. और पूछा, ‘कहा से आए हो..?’ मैंने कहा, जबलपुर. जबलपुर सुनते ही उन्होंने पूछा, ‘हमारे वेगड़ जी कैसे है..?’ मैं एकदम समझ नहीं पाया. फिर ध्यान आया, की वो, हमारे मोहल्ले में, बाबुराव जी के मकान के नीचे रहने वाले ‘वेगड़ सर’ के बारे में बात कर रहे हैं. मुझे सुखद आश्चर्य हुआ. और बाद में रझा जी, वेगड़ जी के बारे में ही बोलते गए. उन्होंने हमारे पास, वेगड़ जी के लिए एक चिठ्ठी, हाथ से लिखकर दी. <br></p><p>जबलपुर पहुंच कर मेरे चचेरे भाई विवेक के साथ मैं उनसे मिलने गया. विवेक उनका विद्यार्थी था. मेरी उनसे हुई यह पहली प्रत्यक्ष भेंट. अत्यंत सरल, सादे पाजामा-कुर्ता पहने हुए वेगड़ सर को जब मैंने रझा साहब की चिठ्ठी दी और वे उनके बारे में क्या बोल रहे थे वो बताया, तो वे बस मुस्कुरा दिए, और विषय बदल दिया. उनसे हुई बातचीत से ही मुझे मालूम हुआ, रझा जी अपने मंडला के हैं. बड़ी श्रध्दा और आदर के साथ, वेगड़ सर, रझा जी के बारे में बात कर रहे थे. दुनिया के दो बड़े कलाकारों का आपस में स्नेह, सम्मान और आदर मैं प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा था. </p><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/36720152_10209068865159026_3833777113664585728_n.jpg" class="kg-image" alt="वेगड़ जी का जाना..."></figure><p>चूंकि वेगड़ जी मोहल्ले वाले ही थे, तो दिखते जरुर थे. पैदल चलना उनका शौक था या उनके यायावर जिन्दगी का हिस्सा, नहीं मालूम. लेकिन वे खूब चलते थे और शायद इसीलिए सदा प्रसन्न दिखते थे. <br></p><p>सन २००५ में संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री गुरूजी के जन्मशताब्दी के अवसर पर ‘विश्व संवाद केंद्र’ के अंतर्गत एक संगोष्ठी मानस भवन में आयोजित की थी. यह तय हुआ की इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करने के लिए अमृतलाल वेगड़ जी को कहा जाए. प्रश्न यह था, ‘संघ के कार्यक्रम में वेगड़ जी आयेंगे या नहीं.’ नरेंद्र जी और मैं उनसे मिलने गए. उन्होंने निमंत्रण सहर्ष स्वीकार किया. वे आए. अत्यंत सारगर्भित, चुटीले व्यंग से भरपूर, रोचक भाषण दिया. बहुत अच्छा बोले. <br></p><p>बाद में उनकी पुस्तक पढी, और वेगड़ जी का एक और रूप देखा, ‘सामान्य वर्ग की भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति करने वाले, लोकप्रिय साहित्यकार का’. यह बड़ा मोहक रूप था. नर्मदा माई, उनके जीवन का हिस्सा थी, वैसे ही, जैसे चित्रकला थी. इन दो हृदयस्थ विषयों के संगम से आभिजात्य कलाकृति का निर्माण होना स्वाभाविक था.. उनके ‘सौदर्यनी नदी नर्मदा’ इस मूल गुजराती पुस्तक को सन २००४ में साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिला. इस पुस्तक का अनेक भाषाओं में अनुवाद हुआ. उनके चार हजार किलोमीटर के नर्मदा परिक्रमा पर आधारित यह पुस्तक जिवंत अनुभवों का चित्रण थी. ‘तीरे तीरे नर्मदा’ और ‘अमृतस्य नर्मदा’ उनकी एनी पुस्तके थी. उसके कुछ वाक्य तो अभी भी याद हैं. एक जगह उन्होंने लिखा हैं, ‘रोटी यह प्रकृति हैं, पूड़ी यह विकृति हैं और भाकर (गाँवों में बनने वाली ज्वार की मोटी रोटी) यह संस्कृति हैं..!’<br></p><p>पिछले कुछ महीनों में दो बार उनके घर जाना हुआ. रा. स्व. संघ के सह सरकार्यवाह, डॉ. मनमोहन जी वैद्य का जबलपुर में प्रवास था. उन्होंने इच्छा प्रकट की, की ‘इस प्रवास में अमृतलाल जी से मिलना हैं’, मैंने वेगड़ जी को फोन लगाया. उन्होंने सहर्ष आमंत्रित किया. मनमोहन जी गुजरात में अनेक वर्षों तक प्रचारक रहे हैं. इसलिए, गुजराती उनकी दूसरी मातृभाषा हैं. हम जब मिलने गए, और मनमोहन जी उनसे गुजराती में संवाद करने लगे, तो वेगड़ जी इतने प्रसन्न हुए की वे मनमोहन जी को उन्ही के घर रुकने को कहने लगे. यह संवाद दीर्घ था, जिसमे दोनों को यह लगा, ‘हम पहले क्यूँ नहीं मिले..?’</p><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/36754118_10209068865879044_7287284682004103168_n.jpg" class="kg-image" alt="वेगड़ जी का जाना..."></figure><p>दो माह पहले, माखनलाल चतुर्वेदी विश्व विद्यालय द्वारा वेगड़ जी को ‘विद्या वाचस्पति’ की उपाधि प्रदान की गयी. चूंकि वेगड़ जी अस्वस्थ होने के कारण उनका भोपाल में जाना संभव नहीं था. अतः कुलपति श्री जगदीश उपासने जी ने तय किया, की यह उपाधि, वेगड जी को, उनके घर पर जाकर देंगे. पिछले माह यह कार्यक्रम हुआ. विश्व विद्यालय के महापरिषद का सदस्य होने के नाते मैं भी उस कार्यक्रम में था. वेगड जी व्हील चेयर पर थे. बीच बीच में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती थी. किन्तु फिर भी वे प्रसन्न थे. उन नब्बे वर्षों के उनके अनुभवों की, यायावर जीवन की, कला के शिखर की, साहित्य के सृजन की ऊर्जा तब भी तरुणाई की ताकत से प्रकट हो रही थी. <br></p><p>वेगड जी का जाना, हमारे बीच के एक ऐसे व्यक्ति का जाना हैं, जो कला, साहित्य का मर्मज्ञ होते हुए भी अत्यंत सरल था. सहज था. हम सब के लिए दीपस्तंभ था. जीवन भरा-पूरा लेकिन मूल्यों के साथ कैसे जीना चाहिए इसका वस्तुपाठ थे, वेगड़ जी..!<br></p><p>मेरी भावपूर्ण श्रध्दांजली.</p><ul><li>प्रशांत पोळ</li></ul>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[कांग्रेसियों, क्या क्या नकारोगे..?]]></title><description><![CDATA[२६ जून के उस काले अध्याय को नकारोगे..?
अनगिनत निरपराध लोगों को जेलों में ठूंस कर उनके जीवन के अमूल्य डेढ़ वर्ष बर्बाद करनेको नकारोगे..?]]></description><link>https://prashantpole.com/kaangresiyon-kyaa-kyaa-nkaaroge/</link><guid isPermaLink="false">60e6ebc86319c914703df41e</guid><category><![CDATA[Emergency]]></category><category><![CDATA[26 June]]></category><category><![CDATA[Indira Gandhi]]></category><category><![CDATA[Kala Din]]></category><category><![CDATA[Apatkal]]></category><category><![CDATA[आपातकाल]]></category><category><![CDATA[इंदिरा गांधी]]></category><category><![CDATA[1947]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Tue, 26 Jun 2018 12:12:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/36228272_10209017987607119_1499553703588265984_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/36228272_10209017987607119_1499553703588265984_n.jpg" class="kg-image" alt="कांग्रेसियों, क्या क्या नकारोगे..?"></figure><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/36228272_10209017987607119_1499553703588265984_n-1.jpg" alt="कांग्रेसियों, क्या क्या नकारोगे..?"><p>२६ जून के उस काले अध्याय को नकारोगे..?</p><p>अनगिनत निरपराध लोगों को जेलों में ठूंस कर उनके जीवन के अमूल्य डेढ़ वर्ष बर्बाद करनेको नकारोगे..?</p><p>मामा क्षीरसागर जैसे अनेक निष्ठावान कार्यकर्ताओं की जेल में हुई असमय मौत को नकारोगे..?</p><p>पवनार आश्रम के युवा प्रभाकर शर्मा ने आपातकाल के विरोध में किया आत्मदहन नकारोगे..?</p><p>क्या क्या नकारोगे, कांग्रेसियों..?</p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/36188748_10209017985327062_5156094778420494336_n.jpg" class="kg-image" alt="कांग्रेसियों, क्या क्या नकारोगे..?"></figure><p>वो जबरन की गयी नसबन्दियों को, और उनके कारण उजड़े हुए अनेक जिंदगियों को..?</p><p>उस तुर्कमान गेट के अभागी रहिवासियों को, जिनको बुलडोजर के नीचा रौंदा..?</p><p>वो लोकतंत्र के पहरियों को जेल में दी गयी अमानुष और बर्बर यातनाओं को..?</p><p>जयप्रकाश नारायण जैसे ऋषितुल्य व्यक्तित्व की किडनी को जेल में खराब करने को..?</p><p>जॉर्ज फर्नांडिस के भाई को बिजली का झटका दे देकर पागल की हद तक ले जाने को..?</p><p>समाचार पत्रों का गला घोटने वाली निरंकुश सेंसरशिप को..?</p><p>किशोर कुमार, विद्या सिन्हा जैसे अनेक कलाकारों को प्रताड़ित करने को..? <br><br></p><p>जवाब दो, कांग्रेसियों..</p><p>किस किस बात को नकारोगे...?  #आपातकाल #Emergency1975</p><ul><li>प्रशांत पोळ</li></ul>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[इन बेरहम डॉक्टरों का सामाजिक बहिष्कार हो...]]></title><description><![CDATA[किन्तु आज के समाचार पत्रों में
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जो कुछ मैंने पढ़ा,
उससे मैं अन्दर तक हिल गया.]]></description><link>https://prashantpole.com/in-berhm-ddonkttron-kaa-saamaajik-bhisskaar-ho/</link><guid isPermaLink="false">60e6eb136319c914703df3fd</guid><category><![CDATA[बेरहम डॉक्टर्स,]]></category><category><![CDATA[जबलपुर]]></category><category><![CDATA[डॉक्टर्स]]></category><category><![CDATA[Doctors]]></category><category><![CDATA[Jabalpur]]></category><category><![CDATA[New Year 2019]]></category><category><![CDATA[Gudi PAdwa]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Sun, 18 Mar 2018 12:09:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/29313390_10208500346386412_466221865371697152_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/29313390_10208500346386412_466221865371697152_n-1.jpg" alt="इन बेरहम डॉक्टरों का सामाजिक बहिष्कार हो..."><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/29313390_10208500346386412_466221865371697152_n.jpg" class="kg-image" alt="इन बेरहम डॉक्टरों का सामाजिक बहिष्कार हो..."></figure><p>आज नवीन वर्ष का पहला दिन.</p><p>कम से कम</p><p>आज के दिन तो</p><p>नकारात्मक समाचार नहीं पढूंगा</p><p>ऐसा सोचा था.</p><p>किन्तु आज के समाचार पत्रों में</p><p>पहले पृष्ठ पर</p><p>जो कुछ मैंने पढ़ा,</p><p>उससे मैं अन्दर तक हिल गया.</p><p>इसके बाद</p><p>अपने आप को</p><p>संस्कारधानी जबलपुर का</p><p>नागरिक कहलाने में</p><p>मैं</p><p>शर्म और झिझक महसूस कर रह हूँ..!<br></p><p>____    ____    ____    ____<br></p><p>कल शनिवार को भेडाघाट में</p><p>एक छोटीसी, मासूम</p><p>दस वर्षीय बच्ची के साथ</p><p>एक चौदह वर्षीय मवाली, गुंडे ने</p><p>दुराचार का प्रयास किया.</p><p>जब वो बिटिया भागने लगी,</p><p>तो मवाली ने उसके पांव में चाक़ू मारा.</p><p>और फिर</p><p>उस खून से लथपथ</p><p>मासूम बच्ची के साथ</p><p>बलात्कार किया..!</p><p>लड़की के पिता,</p><p>अपनी इस अभागी बिटिया को लेकर</p><p>जबलपुर के मेडिकल अस्पताल में आएं.</p><p>लड़की के सर और पांव पर</p><p>चाक़ू के चार बड़े घाव थे.</p><p>वहां से खून बह रहा था.</p><p>लेकिन मेडिकल के बेरहम डॉक्टरों ने,</p><p>और खुद</p><p>सी एम् ओ डॉ. सतीश अहिरवार ने,</p><p>उस बच्ची को</p><p>बिना मलहम पट्टी के</p><p>आठ किलोमीटर दूर</p><p>एल्गिन अस्पताल में जाने को कहा.</p><p>एल्गिन अस्पताल में डॉ. अर्चना ग्रोवर ड्यूटी पर थी.</p><p>एक महिला डॉक्टर.</p><p>लेकिन वहां भी</p><p>मलहम पट्टी किये बिना,</p><p>उस बेरहम महिला ने..</p><p>उस मासूम बिटिया को</p><p>विक्टोरिया अस्पताल में भेज दिया...!<br></p><p>____    ____    ____    ____<br></p><p>हिम्मत देखिये,</p><p>जबलपुर के इन</p><p>मेडिकल व्यवसाय में घुसे</p><p>राक्षसों की....</p><p>साथ में पुलिस होने के बाद भी</p><p>उस अभागी,</p><p>बलात्कारित, खून रिस रही बिटिया को</p><p>फ़ुटबाल के गेंद जैसे</p><p>यहां से वहां भगा रहे थे, वे..!</p><p>बाद में सी एस पी आए....</p><p>लेकिन</p><p>इन दुर्दांत, नरभक्षक डॉक्टरों के आगे</p><p>उनकी भी नहीं चली.</p><p>फिर एस पी ने फोन किया...</p><p>उस दुर्भागी बच्ची को</p><p>फिर मेडिकल ले जाया गया...</p><p>अंत में रात्री ११ बजे,</p><p>घटना के सात घंटे बाद</p><p>उस बिटिया को</p><p>मेडिकल सहायता मिली...!<br></p><p>____    ____    ____    ____<br></p><p>जबलपुर जैसे महानगर में,</p><p>नव वर्ष की पूर्व संध्या पर</p><p>मानवता शर्मसार हुई.</p><p>केंद्र और राज्य सरकार के</p><p>‘बेटी बचाओ, बेटी पढाओ’</p><p>अभियान की</p><p>मिट्टी पलीद हुई.</p><p>डॉक्टरी पेशे को,</p><p>कल इन डॉक्टरों ने कालिख पोत दी.</p><p>मेडिकल के सफ़ेद कोट में</p><p>ये काले डॉक्टर</p><p>इंसानी भेड़िये हैं.</p><p>इन पर जो कार्यवाही होगी,</p><p>वो होगी.</p><p>अपनी रसूख के चलते</p><p>ये सारे डॉक्टर</p><p>शायद निर्दोष छुट भी जाय...</p><p>किन्तु</p><p>उनकी इस असंवेदनशीलता को,</p><p>उनकी इस निर्ममता को,</p><p>उनके इस बहशीपन को,</p><p>उनकी इस उद्दंडता को,</p><p>एक ही सजा हैं –</p><p>इन डॉक्टरों का ‘सामाजिक बहिष्कार’.</p><p>जी हां.</p><p>जबलपुर वासियों,</p><p>आइये...</p><p>संस्कारधानी को इस कलंक से</p><p>कुछ हद तक बचाए..</p><p>ताकि कल फिर कोई डॉक्टर</p><p>इतना बेरहम न होने पाए..</p><p>हम सब मिलकर,</p><p>मेडिकल के सी एम् ओ,</p><p>डॉ. सतीश अहिरवार,</p><p>एल्गिन की डॉ. अर्चना ग्रोवर,</p><p>और इस बेशर्म प्रकरण में शामिल</p><p>उन तमाम लोगों का</p><p>सामाजिक बहिष्कार करे..!</p><p>इस असंवेदनशील मानसिकता को</p><p>हम नकारे..!</p><ul><li>प्रशांत पोळ</li></ul>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[बापूजी नहीं रहे..!]]></title><description><![CDATA[मोबाईल खोला तो पता चला, ‘श्रध्देय चंद्रशेखर अर्थात बापूजी गुप्ते नहीं रहे.”]]></description><link>https://prashantpole.com/baapuujii-nhiin-rhe/</link><guid isPermaLink="false">60e804826319c914703df4d2</guid><category><![CDATA[बापूजी]]></category><category><![CDATA[बापूजी गुप्ते]]></category><category><![CDATA[Bapuji Gupte]]></category><category><![CDATA[Bapuji Gupte Death news]]></category><category><![CDATA[RSS]]></category><category><![CDATA[Rashtriya Swayam Sevak Sangh]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Thu, 15 Mar 2018 08:10:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/29214937_10208483214598128_2583675441340481536_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/29214937_10208483214598128_2583675441340481536_n-1.jpg" alt="बापूजी नहीं रहे..!"><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/29214937_10208483214598128_2583675441340481536_n.jpg" class="kg-image" alt="बापूजी नहीं रहे..!"></figure><p><strong>सायंकाल जलगांव जाने के लिए ट्रेन में बैठा. दिन भर की अत्यधिक व्यस्तता के कारण सोशल मीडिया के सन्देश देखना संभव ही न था. अब थोड़ी फुर्सत थी. मोबाईल खोला. देखा, तो नई व्यवस्था में अ. भा. सह-प्रचारक प्रमुख बने हमारे क्षेत्र प्रचारक मान. अरुण जैन जी का सन्देश था, ‘श्रध्देय चंद्रशेखर अर्थात बापूजी गुप्ते नहीं रहे.”<br></strong></p><p>पढ़ते ही साथ, मेरे स्मृतिकोष को मानो किसी ने डंख मार लिया. बापूजी से संबंधित अनेक यादे, अनेक घटनाएं सामने आती गयी.  <br></p><p>जबलपुर में मैं शाखा जाने लगा और मेरा संपर्क श्रध्देय बापूजी से हुआ. होना ही था. बाल गण का कोई व्यक्ति बापूजी से न मिले, यह संभव ही नहीं था. सायं शाखा थी. बापूजी की स्वतः की शाखा प्रभात में होती थी. किन्तु, सुबह १० बजे से सायं ५ बजे तक हाईकोर्ट का कामकाज छोड़ा, तो बापूजी पूर्णतः संघ को समर्पित थे. इसलिए वे स्वाभाविक हमारी सायं शाखा में भी आते थे. मैदान सींचने से लेकर तो शिशु गण के किसी स्वयंसेवक को शाखा के बाद घर छोड़ने जाने तक, सारे काम करते थे. हम बच्चों में, बिलकुल बच्चों जैसा रहते थे, मजाक करते थे, हसांते थे, गीत गाते थे, बहुत अच्छा शंख (बिगुल) बजाते थे... <br></p><p>बहुत पहले, केशव सायं शाखा अरुण डेरी के सामने लगती थी. रोज सौ से ज्यादा उपस्थिति रहती थी. बापूजी वहीँ, हमारे पूर्व महापौर श्री सदानंद गोडबोले जी के बाड़े में, रहते थे. सारे राईट टाउन में बापूजी प्रसिध्द थे. बापूजी याने शाखा. बापूजी याने संघ. यही उनकी पहचान थी. संघ के किसी उत्सव से पहले, बापूजी का उत्साह देखते बनता था. गणवेश को प्रेस करना, जूतों को पॉलिश, बेल्ट के बकल को ब्रासो से चमकाना आदि अनेक काम चलते रहते थे. सारे स्वयंसेवकों की तयारी करवाना यह मानो उनकी जिम्मेवारी रहती थी. उस उत्सव के समय, संचलन में घोष बजाते समय बापूजी का चेहरा अत्यंत आनंद से चमकता रहता था. <br></p><p>फिर १९७५ में आपातकाल आया. इंदिरा जी ने संघ पर प्रतिबंध लगाया. अनेक स्वयंसेवक गिरफ्तार हुए. किन्तु सौभाग्य से बापूजी बच गए. लेकिन बापूजी संघ का काम करते रहे. गिरफ्तारी से डरने वालों में वे थे ही नहीं. शाखा नहीं थी, तो अन्य उपक्रम प्रारंभ हुए. गुरूवार का भजन का कार्यक्रम बड़ा पसंदीदा था. लगभग २० – २५ स्वयंसेवक उसमे आते थे. बापूजी अपने बुलंद स्वर में भजन गाते थे. <br></p><p>पक्का स्मरण नहीं हैं, शायद १९७६ का जनवरी महीना होगा. बापूजी ने तय किया की अगले रविवार को केशव नगर के सभी स्वयंसेवक वनसंचार के लिए जायेंगे. स्थान तय हुआ – रानी दुर्गावती की समाधि. १८ किलोमीटर दूर. आपातकाल के कारण दूर का स्थान चयन करना आवश्यक था. अपेक्षा थी, ३० से ३५ स्वयंसेवक आयेंगे. किन्तु, रविवार की सुबह नियत स्थान पर मिले, तो हम मात्र ३ स्वयंसेवक थे. मैं, सुधीर और बापूजी..! बाकी सभी घरों में, आपातकाल के डर से, जाने के लिए मनाई हो गयी थी.<br></p><p>लेकिन मजे की बात, फिर भी हमारा वन संचार का कार्यक्रम हुआ. जैसा सोचा था, वैसा ही. वहां बापूजी ने शाखा भी ऐसी ही लगाई, जैसे ३० स्वयंसेवक हो. सारे कार्यक्रम वैसे ही हुए. खूब आनंद आया. आते समय गौर नदी के पुल पर बापूजी ने हम दोनों को मुन्गौड़े खिलाएं. उन मुन्गौड़े का स्वाद आज तक जिव्हा पर हैं..!<br></p><p>आपातकाल हटने के दिन, हम सब केशव कुटी पहुचे. सबसे उत्साह में थे, बापूजी. हम सब को लेकर पूरे भवन को उन्होंने झाड़ू लगायी. सामने में जमीन के नीचे पानी की जो टंकी थी, उस में खुद उतर कर साफ़ किया. उस दिन, शायद बापूजी को नया जीवन मिल रहा था.<br></p><p>बाद में उनका स्थानांतरण ग्वालियर में हुआ. १९८१ में उसने ग्वालियर के हाई कोर्ट में मिलना भी स्मृतिकोष में अंकित हैं. ग्वालियर में ही वे सेवानिवृत्त हुए. संघ कार्यालय के पास घर लेकर रहते थे, और एक पूर्णकालिक कार्यकर्ता के माफिक संघ कार्य करते थे.<br></p><p>बापूजी आदर्श स्वयंसेवक थे. जीवन भर अविवाहित रहे. संघ कार्य यही उनका जीवन था, उनका संसार था. हम स्वयंसेवकों को अतीव स्नेह देते थे. मेरे जैसे अनेक स्वयंसेवकों को, ‘कुछ बनने की आयु में’ उन्होंने आदर्शों से परिचय कराया. हमारे जीवन में कुछ उदात्त भाव प्रकट हो, कुछ ध्येय भाव निर्माण हो, इसकी पूरी चिंता उन्होंने की. उनका स्वतः का संसार तो नहीं था. किन्तु स्वयंसेवकों का विशाल परिवार, यही उनका परिवार था. <br></p><p>आज प्रातः महाराष्ट्र के परभणी में ९० वर्ष के आयु में यह ज्योति शांत हुई.<br></p><p>ऐसे ध्येयासक्ती से परिपूर्ण, संघ समर्पित, आदर्श स्वयंसेवक श्रध्देय बापूजी गुप्ते को मेरे विनम्र श्रध्दासुमन..!</p><ul><li>प्रशांत पोळ</li></ul>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[अपनी भाषा]]></title><description><![CDATA[यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण हैं की संपन्न और समृध्द भाषाओँ का देश होने के बाद भी हमारे देश में अंग्रेजी का न केवल चलन-वलन हैं, अपितु अंग्रेजी यह संभ्रांत लोगोंकी भाषा मानी जाती हैं. यदि आप अंग्रेजी में बात करते हैं, तो ही आप बुध्दिजीवी, विद्वान, आधुनिक, कलाप्रेमी इत्यादि हैं, ऐसा माना जाता हैं. ]]></description><link>https://prashantpole.com/bhartiya-bhashayen/</link><guid isPermaLink="false">60e6ea186319c914703df3df</guid><category><![CDATA[Apni bhasha]]></category><category><![CDATA[Mother Toungue]]></category><category><![CDATA[Native Language]]></category><category><![CDATA[Indian Languages]]></category><category><![CDATA[Ancient Indian Knowledge]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Sat, 10 Mar 2018 12:05:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/29067396_10208450052769103_2175328320411926528_n-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/29067396_10208450052769103_2175328320411926528_n-1.jpg" alt="अपनी भाषा"><p></p><ul><li>प्रशांत पोळ <br></li></ul><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/29067396_10208450052769103_2175328320411926528_n.jpg" class="kg-image" alt="अपनी भाषा"></figure><p>राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की प्रतिनिधी सभा की बैठक नागपुर में चल रही हैं. इस बैठक में कुछ प्रस्ताव पारित होते हैं. देश में उन प्रस्तावों के अनुरूप वातावरण बने यह अपेक्षा होती हैं.<br></p><p>इस वर्ष का पहला प्रस्ताव पारित हो गया हैं. यह प्रस्ताव भारतीय भाषाओं के गरिमा, सम्मान, संरक्षण, संवर्धन, और दैनंदिन उपयोग को लेकर हैं. <br></p><p>यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण हैं की संपन्न और समृध्द भाषाओँ का देश होने के बाद भी हमारे देश में अंग्रेजी का न केवल चलन-वलन हैं, अपितु अंग्रेजी यह संभ्रांत लोगोंकी भाषा मानी जाती हैं. यदि आप अंग्रेजी में बात करते हैं, तो ही आप बुध्दिजीवी, विद्वान, आधुनिक, कलाप्रेमी इत्यादि हैं, ऐसा माना जाता हैं. <br></p><p>पैंतीस से ज्यादा देशों की तो मैंने भी यात्रा ही हैं. किन्तु मुझे (अंग्रेजी भाषिक देश, अर्थात इंग्लैंड, अमरीका, ऑस्ट्रेलिया आदि को छोड़कर) भारत यह एकमात्र देश ऐसा मिला, जहां दो समान भाषा बोलने वाले लोग, आपस में मिलने पर भी अंग्रेजी में संवाद करते हैं..!</p><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/29066948_10208450051249065_5639466787507535872_n.jpg" class="kg-image" alt="अपनी भाषा"></figure><p>फ़्रांस में यदि दो फ्रेंच आदमी मिले, और आपस में अंग्रेजी में बोलने लगे, तो उन्हें ‘अनाडी’ समझा जाता हैं. यही हाल जर्मनी में हैं. यही जापान में, इजराइल में, हॉलैंड में, स्पेन में, मेक्सिको में, इंडोनेशिया में... सभी देशों में. <br></p><p>दुर्भाग्य से हमारे देश में इस ‘अनाडीपन’ को लोग अपनी बुध्दिमत्ता समझते हैं...!<br></p><p>संघ के प्रस्ताव में अपील हैं, स्वयंसेवकों से, समाज से, सरकार से, की वे भारतीय भाषाओं को प्राथमिकता दे. अपने बच्चों की प्राथमिक / माध्यमिक शिक्षा मातृभाषा में या अन्य भारतीय भाषाओँ में ही करे. आपस में भारतीय भाषाओं में ही संवाद करे... आदि. <br></p><p>मेरा यह मानना हैं की देश को सुदृढ़, सक्षम और संपन्न बनाने में, ‘भाषा’ यह एक बहुत बड़ा ‘कारक’ हैं. इस दृष्टि से संघ का यह प्रस्ताव अत्यंत महत्वपूर्ण हैं. <br></p><p>लगभग एक वर्ष पहले, इजराइल ने हिब्रू भाषा किस प्रकार से उनके देश में लागू की, इस पर एक टिप्पणी लिखी थी. उसे पुनः दे रहा हूँ –<br></p><p>१४ मई, १९४८ को जब इजराइल बना, तब दुनिया के सभी देशों से यहूदी (ज्यू) वहां आये थे. अपने भारत से भी ‘बेने इजराइल’ समुदाय के हजारों लोग वहां स्थलांतरित हुए थे. अनेक देशों से आने वाले लोगों की बोली भाषाएं भी अलग अलग थी. अब प्रश्न उठा की देश की भाषा क्या होना चाहिए..? उनकी अपनी हिब्रू भाषा तो पिछले दो हजार वर्षों से मृतवत पडी थी. बहुत कम लोग हिब्रू जानते थे. इस भाषा में साहित्य बहुत कम था. नया तो था ही नहीं. अतः किसी ने सुझाव दिया की अंग्रेजी को देश की संपर्क भाषा बनाई जाए. पर स्वाभिमानी ज्यू इसे कैसे बर्दाश्त करते..? उन्होंने कहा, ‘हमारी अपनी हिब्रू भाषा ही इस देश के बोलचाल की राष्ट्रीय भाषा बनेगी.’<br></p><p>निर्णय तो लिया. लेकिन व्यवहारिक कठिनाइयां सामने थी. बहुत कम लोग हिब्रू जानते थे. इसलिए इजराइल सरकार ने मात्र दो महीने में हिब्रू सिखाने का पाठ्यक्रम बनाया. और फिर शुरू हुआ, दुनिया का एक बड़ा भाषाई अभियान..! पाँच वर्ष का.<br></p><p>इस अभियान के अंतर्गत पूरे इजराइल में जो भी व्यक्ति हिब्रू जानती थी, वह दिन में ११ बजे से १ बजे तक अपने निकट के शाला में जाकर हिब्रू पढ़ाएगी. अब इससे बच्चे तो पाँच वर्षों में हिब्रू सीख जायेंगे. बड़ों का क्या..? <br></p><p>इस का उत्तर भी था. शाला में पढने वाले बच्चे प्रतिदिन शाम ७ से ८ बजे तक अपने माता-पिता और आस पड़ोस के बुजुर्गों को हिब्रू पढ़ाते थे. अब बच्चों ने पढ़ाने में गलती की तो..? जो सहज स्वाभाविक भी था. इसका उत्तर भी उनके पास था. अगस्त १९४८ से मई १९५३ तक प्रतिदिन हिब्रू का मानक (स्टैण्डर्ड) पाठ, इजराइल के रेडियो से प्रसारित होता था. अर्थात जहां बच्चे गलती करेंगे, वहां पर बुजुर्ग रेडियो के माध्यम से ठीक से समझ सकेंगे.<br></p><p>और मात्र पाँच वर्षों में, सन १९५३ में, इस अभियान के बंद होने के समय, सारा इजराइल हिब्रू के मामले में शत प्रतिशत साक्षर हो चुका था..!<br></p><p>आज हिब्रू में अनेक शोध प्रबंध लिखे जा चुके हैं. इतने छोटे से राष्ट्र में इंजीनियरिंग और मेडिकल से लेकर सारी उच्च शिक्षा हिब्रू में होती हैं. इजराइल को समझने के लिए बाहर के छात्र हिब्रू पढने लगे हैं..!<br></p><p>ये हैं इजराइल..! जीवटता, जिजीविषा और स्वाभिमान का जिवंत प्रतीक..!”</p><ul><li><strong>प्रशांत पोळ</strong></li></ul>]]></content:encoded></item><item><title><![CDATA[तकनिकी और आधुनिकता]]></title><description><![CDATA[कल से दिल्ली में हूँ. Convergence India के कांफ्रेंस में हिस्सा लेने आया हूँ. Exhibition भी काफी बड़ी हैं. ]]></description><link>https://prashantpole.com/tknikii-aur-aadhuniktaa/</link><guid isPermaLink="false">60e6f3356319c914703df447</guid><category><![CDATA[technology]]></category><category><![CDATA[New Age technology]]></category><category><![CDATA[Delhi]]></category><category><![CDATA[IOT]]></category><category><![CDATA[Brodcasting]]></category><category><![CDATA[Prashant Pole]]></category><dc:creator><![CDATA[Prashant Pole]]></dc:creator><pubDate>Thu, 08 Mar 2018 12:44:00 GMT</pubDate><media:content url="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/28827579_10208436737156221_8194788939398364439_o-1.jpg" medium="image"/><content:encoded><![CDATA[<figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/28619082_10208436737836238_9062258346150069594_o.jpg" class="kg-image" alt="तकनिकी और आधुनिकता"></figure><ul><li>प्रशांत पोळ <br></li></ul><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/28827579_10208436737156221_8194788939398364439_o-1.jpg" alt="तकनिकी और आधुनिकता"><p>कल से दिल्ली में हूँ. Convergence India के कांफ्रेंस में हिस्सा लेने आया हूँ. Exhibition भी काफी बड़ी हैं. टेलिकॉम, IoT और ब्राडकास्टिंग पर अलग अलग समानांतर सत्र चल रहे हैं. IoT में बहुत कुछ हो रहा हैं और अगले एक / दो वर्षों में और अधिक होने वाला हैं. सारा संपर्क संचार, वायरलेस पर केन्द्रित हो रहा हैं. अपने देश में 5G आ रहा हैं....<br></p><p>कल टेलिकॉम के प्रारंभिक सत्र में एस्टोनिया की सूचना तकनिकी एवम् उद्यमिता मंत्री सुश्री उर्वे पालो ने जो कुछ कहा, उसे सुनकर भविष्य में हमारे लिए क्या रखा हैं, इसका चित्र सामने आया. <br></p><p>एस्टोनिया यह बाल्टिक देशों की श्रेणी में आता हैं. १९९१ में सोवियत संघ के विघटन के बाद बना हुआ देश. छोटासा हैं. मात्र १३ लाख जनसंख्या. फ़िनलैंड के पास हैं. सूरज के धूप को तरसने वाला देश हैं..!<br></p><p>किन्तु एस्टोनिया, दुनिया के सर्वाधिक प्रगत डिजिटल देशों की श्रेणी में आता हैं. वहां कागजों का चलन लगभग नहीं के बराबर हैं. सब कुछ डिजिटल प्रणाली से होता हैं. सुश्री उर्वे पालो ने बोलते हुए कहा की ‘अब तो मैं कागजों पर हस्ताक्षर भी वर्ष में एखाद बार ही करती हूँ. बाकी समय तो डिजिटल हस्ताक्षर चलते हैं.</p><p><br></p><figure class="kg-card kg-image-card"><img src="https://prashantpole.com/content/images/2021/07/28827579_10208436737156221_8194788939398364439_o.jpg" class="kg-image" alt="तकनिकी और आधुनिकता"></figure><p>सुश्री उर्वे पालो मंत्री हैं. दो, दो विभागों की मंत्री हैं. उन्हें अनेक आलेखों पर, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने पड़ते होंगे. हस्ताक्षर, जो उनकी अपनी पहचान हैं..! वो हस्ताक्षर भी वें अब डिजिटल सिस्टम अर्थात, मशीन के माध्यम से कर रही हैं.<br></p><p>कितना अच्छा, कितना बुरा, मुझे नहीं मालूम. लेकिन तकनिकी अगर हमारी व्यक्तिगत अभिव्यक्ति रोकती हैं, तो तकनिकी के आधुनिकीकरण और परंपरागत कौशल के बीच संतुलन बनाना होगा. तकनिकी के आधुनिकीकरण से यदि हमारा लिखना, पढ़ना बंद होता हैं, तो वह तकनिकी आधुनिक हैं या हमारे इन्द्रियों की शक्ति को नष्ट करने वाला माध्यम हैं, इसका भी विचार करना पड़ेगा..!!</p><ul><li><strong>प्रशांत पोळ  <br></strong><br></li></ul>]]></content:encoded></item></channel></rss>